ज़रा फ़ासले से मिला करो .
उर्दू के महान शायर बशीर बद्र कभी नहीं जानते थे कि इक दिन उनकी लिखी हुई पंक्तियां दुनिया भर में फैली हुई महामारी के लिए सत्य साबित होंगीं:-
यूँ ही बे-सबब न फिरा करो
कोई शाम घर में भी रहा करो ।।
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है
उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो।।
कोई हाथ भी न मिलाएगा
जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है
ज़रा फ़ासले से मिला करो l।
आज की आबोहवा भी हमें यही संदेश दे रही है कि हमें 31 मार्च तक घर के बाहर नहीं जाना है या फिर कुछ दिन और..।मेरा यह मानना है कि हमें वास्तव में ही थोड़े दिन सड़कों पर निकलने में परहेज़ करना चाहिए।अस्पतालों में बंद रहने से बेहतर है कि हमअपने परिवार के संग प्यार से रहें और सावधानी बरतें क्योंकि हमारे देश में उतनी सुविधाएं उपलब्ध नहीं जितनी बाहर के मुल्कों में पर्याप्त रूप से उपलब्ध हैं।इस संकट की घड़ी में मैं प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथ-साथ एमरजेंसी में खुले हस्पतालों का,चिकित्सा क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों,व पूरे देश ने ताली बजा कर , थाली बजा कर ,शंख बजा कर व आवश्यक सेवाएं प्रदान करने वाले तथा सफाई कर्मचारियों के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ... उन सभी का तह दिल से धन्यवाद करती हूँ।आइये हम सभी मिलकर प्रभु से प्रार्थना करें कि इस कोरोना महामारी के ख़िलाफ़ युद्ध में मानवता की जीत हो .
स्वयं भी बचें ..
देश को बचाएँ ...
विश्व को बचाएँ ....
जय हिंद!
जसप्रीत कौर फ़लक
वरिष्ठ लेखिका
