क़हर.

 

चहुँओर विनाश के साये हैं,

तम के बादल गहरायें हैं,

घनघोर क़हर अब बरपा है,

कोई आस नज़र न आये है,

मन सबके घबराये हैं।


उसकी तो रचना रही अटल,

धूप खिली,चाँद भी निकला,

न प्रकृति ने नियम बदला

इंसान जमीं तेरी है हिली !

तेरी ही नीयत है बदली।


कहता खुद को तु सर्जनकार,

मैं हूँ निर्माता मैं विध्वंसकार।

मच रहा हर तरफ़ हाहाकार,

तेरा निर्माण,बना बेहाल,

विश्व बन रहा नर कंकाल।


अब मान तेरा न कोई वश है।

उसके सृजन पर न तेरा हक़ है।

मान ले मानव अब अपनी हार,

करबद्ध हो,कर आर्त पुकार,

बन दीन,लगा उसको गुहार,

जो है जहां का पालनहार।


अस्तित्व उसी का निरंकार 

शीश नवाकर उसे स्वीकार

वही सुनेगा तेरी चित्कार,

वही विधाता जीवनदाता,

हर शय में उसका है वास ,

मुश्किलों में रख उसी पर आस।


सुमन शर्मा २३/३/२०२०

(गुजरात)