भीतर की चमक / ललित बेरी .

दुनिया का एक कड़वा सच है—
इंसान की क़द्र अक्सर ज़रूरत पड़ने पर ही होती है, जब तक किसी का काम न हो…लोग पास आने की वजह भी नहीं ढूँढ़ते।

हीरे को ही देखिए…
उसकी कीमत लाखों में होती है, पर जब तक /ज़रूरत न पड़े
वो भी तिजोरी में बन्द रखा जाता है।

इंसान भी कभी-कभी
उसी बंद तिजोरी जैसा महसूस करता है—कीमती होकर भी अनदेखा।
मगर इसका मतलब ये नहीं कि उसकी कीमत कम है।

लोग बदलते रहेंगे…रिश्तों का वक़्त भी।
पर आप अपनी चमक अपने भीतर बनाए रखिए…
क्योंकि हीरा चाहे कहीं भी हो, हीरा ही रहता है।