आत्मा की अदालत में अवश्य खड़े हों एक बार/ललित बेरी.
हम अक्सर कहते हैं— फलाँ इंसान में यह कमी है…उसने ये ग़लती की…वो ऐसा क्यों है…?
पर ज़रा ठहरकर सोचिए—
अगर हम हर सुबह अपनी ही ग़लतियों की उँगलियों पर गिनती करें, तो शायद दूसरे की ज़िंदगी में उँगली उठाने का वक़्त ही न बचे।
क्योंकि सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि हर इंसान अपनी लड़ाई लड़ रहा है…अपनी कमज़ोरियों से… अपनी परिस्थितियों से।
दूसरों पर फ़ैसला सुनाने से पहले अपनी आत्मा की अदालत में एक बार खड़े हो जाइए।
शायद तब हम जजमेंट की जगह समझ बाँटना सीख जाएँ…नफ़रत की जगह मोहब्बत दे जाएँ।
और याद रखिए—
दूसरों की कमियों पर रोशनी डालना आसान है, पर अपनी कमियों पर काम करना ही असल इंसानियत है।
