मैं तुम्हें अहसासों में मिलती रही
तुम मुझे शब्दों में ढूँढते रहे
लम्बा अरसा निकल गया यूँ ही
ज़िंदगी, ज़िंदगी को मिलने को तरसती रही।
पलकों में कुछ ख़्वाब
दिल में एक चाहत
मिले ना तुम फिर कभी
उम्र यूँही आगे सरकती रही
उम्र यूँही आगे सरकती रही।
सरू जैन