निर्जीव है कविता अभी .

अभी निर्जीव है कविता मेरी,

निर्जीव इसका हर इक लफ्ज़। 

न भर पाया हूँ जान इसमें ,

अभी है ही नहीं मुझमें वस्फ। 


अभी पाना बहुत कुछ बाकी है, 

अभी तबियत करनी है रौशन। 

अभी और ख्याल उगाने हैं, 

अभी सोच के बदलेंगे मौसम। 


अभी करनी है हस्ती बुलंद , 

ज़हन के गलियारे महकाने हैं। 

अभी बाकी हैं करने खाली, 

किताबों के जो मयखाने हैं। 


बड़े उंचे हैं गरूर के गुम्बद, 

रफता-रफता गिर जाऐंगे। 

जब अंतर्मन खाली होगा, 

तभी विचार जीवित हो पाएंगे। 


जब खुदी भूल लिखूंगा कविता,

और लबरेज़ हकीकत से होगी। 

'गुरवीर' तब सीखेगा कुछ लिखना, 

तब ही मेरी कविता जीवित होगी। 


                                 - गुरवीर सिआण