गीत का जन्म.

 

निर्जीव, मर रही सांसो के साथ 

कब आई.....वो एक सांस 

मिल गयी आँखों को दिव्य-ज्योति 

सखी बन गयी ख़ामोशी,तन्हाई 

जाने कब भाने लगा 

आकाश का सूनापन,ख़ामोश दर्पन 

जाने कब गूंज उठी शहनाई 

दिल की अंगनाई में 

मन भटकने लगा 

कल्पनाओं की दुनिया में 

सपनों के संसार में.....


फिर  सपनों की शहजादी 

तलाश करने लगी

सपनों का राजकुमार 

कभी मन उलझ जाता

आशा और निराशा के भंवर में 

फिर अच्छी लगने लगतीं

मीरां की प्रेम कहानियांँ

अमृता  प्रीतम की बेबाक ज़िन्दगी 

लैला मजनूँ का किस्सा 

उदास फिल्मी गीत.....


दूर कहीं रेत के समन्दर में 

बाल उलझने लगे नर्म हवाओं से 

आँखें भारी होने लगीं सपनों के बोझ से 


फ़िर अचानक;

पनपने लगा शब्दों का अंकुर, 

अच्छी लगने लगी सरगम

नाचने लगे होंठों पे गीत 

सुर - ताल लय बन गये

मेरे मन के मीत।।

                 जसप्रीत कौर फ़लक